भारत में टीबी, मातृ और किशोर स्वास्थ्य की चुनौतियों का समाधान: समुदाय आधारित दृष्टिकोण क्यों होता है कारगर

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कर्नाटक हेल्थ प्रमोशन ट्रस्ट (केएचपीटी) द्वारा आज राजधानी में आयोजित एक गोलमेज बैठक में तीन महत्वपूर्ण स्वास्थ्य क्षेत्रों – मातृ एवं किशोर स्वास्थ्य तथा टीबी पर ध्यान केंद्रित करते हुए उनकी समस्याओं और आगे के उपायों पर चर्चा की गई।

केएचपीटी पूरे भारत में सर्वाधिक पिछड़े समुदायों के लिए स्वास्थ्य पहल पर काम करता है। यह समुदाय के सदस्यों से मिलने वाले मजबूत इनपुट के साथ साक्ष्य-आधारित, इनोवेटिव दृष्टिकोण के आधार पर अपनी योजना और कार्यान्वयन रणनीतियां तैयार करता है।

केएचपीटी के मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी श्री एच. एल. मोहन ने अपने उद्घाटन भाषण में इन पहलुओं पर विशेष जोर दिया। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे केएचपीटी ने समुदाय-आधारित दृष्टिकोण अपनाया, जो इन तीन मुख्य क्षेत्रों में उनके कार्यक्रमों की सफलता में योगदान करने वाला महत्वपूर्ण कारक था। उन्‍होंने आगे कहा, ‘‘हमारे अनुभव से पता चला है कि जब हम इनपुट लेते हैं और उन समुदायों के सदस्यों को शामिल करते हैं जिनके साथ हम काम करते हैं, तो एक बड़ी और अधिक प्रासंगिक समझ विकसित होती है और हमारी योजना और रणनीतियां जमीनी वास्तविकताओं पर आधारित होती हैं। इसके अलावा समुदाय का ओनरशिप होता है जो कार्यक्रमों की सफलता में बहुत योगदान देता है।”

24 मार्च को विश्व टीबी दिवस है, ऐसे में राष्ट्रीयक्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के उप महानिदेशक डॉ. राजेंद्र जोशी का संबोधन का विशेष महत्व था। गोलमेज की थीम को प्रतिध्वनित करते हुए डीडीजी के प्रति सरकार का ध्‍यान आकर्षित किया। उन्होंने विभिन्न तरीकों पर चर्चा की जिससे नीति निर्माता टीबी देखभाल और समर्थन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इन विकेन्द्रीकृत दृष्टिकोणों को तेज करने में मदद कर सकते हैं। उन्‍होंने आगे कहा, ‘‘सरकार टीबी उन्मूलन की दिशा में एक बहु-क्षेत्रीय, समग्र और अंतःक्रियात्मक प्रतिक्रिया को लागू कर रही है। हमारा काम यह सुनिश्चित करना भी है कि डिजिटल समाधान को उपयोग में लाया जाए और लागत प्रभावी दृष्टिकोण प्रदान किया जाए।’’

जन आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में डॉ. दलबीर सिंहअध्यक्षग्लोबल कोलेशन अगेंस्ट टीबी ने देश भर में व्‍यापक जनसमर्थन – सही मायने में एक जन आंदोलन- के माध्यम से ‘टीबी मुक्त भारत’ के लक्ष्य तक पहुंचने में सरकार के नेतृत्व की बात की। उन्‍होंने कहा, ‘‘टीबी के खिलाफ लड़ाई में निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। यह केवल शीर्ष अधिकारियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पंचायती राज संस्थानों के साथ मिलकर भी काम करना चाहिए। जागरूकता पैदा करने और जमीनी स्तर पर सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए उनकी संवेदनशीलता और प्रक्रिया में भागीदारी महत्वपूर्ण है।’’

इसके बाद केएचपीटी टीम के सदस्यों और समुदाय के लोगों ने विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।

टीबी देखभाल में क्या बाधाएं हैं और उन्हें कैसे सर्वोत्तम तरीके से दूर किया जा सकता है? डॉ. रेहाना बेगमप्रोजेक्ट डायरेक्टरब्रेकिंग द बैरियर्सटीबीकेएचपीटी ने लैंगिग और कलंक जैसे मुद्दों को दूर करने में बहुत ही सफल परिणामों के साथ केएचपीटी के अनुभवों को साझा किया। केएचपीटी के किशोर कार्यक्रमों पर प्रकाश डालते हुए सुश्री मैत्रेयी रविकुमारस्‍ट्रैटजीक लीडकिशोर स्वास्थ्यकेएचपीटी ने अत्यधिक सफल ‘स्फूर्ति’ कार्यक्रम और लड़कियों से संबंधित अन्य कार्यक्रमों के बारे में विस्तार से बताया। मातृ एवं बाल्‍य की पहल मातृ एवं बाल पोषण को सुश्री अग्निता आरस्‍ट्रैटजीक लीडमैटर्नल नियोनेटल एवं चाइल्‍ड हेल्‍थकेएचपीटी द्वारा रेखांकित किया गया।

सुश्री मल्लिका थराकनलीडनॉलेज मैनेजमेंटऔर रिजल्‍ट डिलिवरी ऑफिसरकेएचपीटी ने इस मुद्दे को बढ़ावा देने के महत्व और इसमें मीडिया की भूमिका के बारे में चर्चा की। डॉ. सुकृति चौहानएडवोकेसी एंड प्रोग्राम लीडकेएचपीटी द्वारा संचालित चर्चा में तरह के कई मुद्दे सामने आए।

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