यूक्रेन-रूस युद्ध से महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी

0
56
99 Views

कोरोना महामारी के आर्थिक दुष्प्रभाव से उबर रही आम जनता पर अब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण बढ़ रही महंगाई की मार पड़नी शुरू हो गई है। इस युद्ध के कारण कच्चे माल की कीमतों में लगातार तेजी आ रही है। अब कंपनियों ने इस बोझ को ग्राहकों पर डालना शुरू कर दिया है।

दूध से मैगी तक के बढ़े दाम

कंपनियों ने पैकेटबंद खाने के सामान की कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं। इसकी शुरूआत नेस्ले इंडिया, हिन्दुस्तान यूनीलिवर लिमिटेड (एचयूएल) और दूध उत्पाद बेचने वाली कंपनियों ने की है। नेस्ले ने मैगी की कीमतों में 9 से 16 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी है। वहीं, एचयूएल ने कॉफी के अलग-अलग उत्पादों की कीमतों में 1.5 से 14 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है। अमूल, पराग और मदर डेयरी ने दूध की कीमतों दो रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है।

15 दिनों में चिकन की कीमतों में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी

खुदरा बाजार में बीते 15 दिनों में चिकन की कीमतों में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और यह 200 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 280 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। इसी प्रकार से आलू की कीमतों में भी 20 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध चलता रहा तो महंगाई को बढ़ने के लिए जो भी उपाय किए जाएंगे उसके असर से बेरोजगारी जैसी समस्याएं भी बढ़नी तय हैं। इससे कोरोना के बाद धीरे धीरे आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था की गति में अवरोध पैदा हो सकता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है।

एक महीने में 18 प्रतिशत तक बढ़ी खाद्य तेलों की कीमत

  • मूंगफली तेल 15 फरवरी को 173.40 रुपये था और 16 मार्च को 181.49 रुपये। कुल बढ़ोती 4.66 फीसद
  • सरसों तेल 15 फरवरी को 188.06 रुपये था और 16 मार्च को 190.44 कुल इजाफा 1.26 फीसद
  • वनस्पति 15 फरवरी को 140.95 रुपये प्रति किलो था और 16 मार्च को 152.88 कुल तेजी 8.46 फीसद की।
  • सोया तेल 15 फरवरी को 146.87 रुपये प्रति किलो था और 16 मार्च को 162.27। इसमें महंगाई बढ़ी 10.48 फीसद।
  • सूरजमुखी तेल 15 फरवरी को 148.90 रुपये प्रति किलो था और 15 मार्च को यह 18.70 फीसद बढ़कर 176.75 पर पहुंच गया।
  • पाम तेल भी एक महीने में 130.87 से 17.39 फीसद बढ़कर 153.64 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

युद्ध का सबसे ज्यादा असर सब्जियों के दामों पर पड़ेगा। सब्जी की पैदावार में इस्तेमाल होने वाली खाद, पोटाश की वैश्विक सप्लाई का करीब 65 प्रतिशत हिस्सा रुस और यूक्रेन से आता है। भारत करीब 30 लाख टन पोटाश का आयात करता है। इसमें से 17 फीसदी पोटाश और 60 फीसदी एनकेपी यानी नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम खाद का आयात रूस से किया जाता है। युद्ध से वहां उत्पादन प्रभावित हो रहा है और उसका असर देश को होने वाली सप्लाई पर भी पड़ेगा। रूस-यूक्रेन-बेलारूस से होने वाली इस सप्लाई का विकल्प जल्द ही न तलाशा गया तो सब्जियों की महंगाई बड़े पैमाने पर बढ़ेगी।

प्रणव सेन, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ

रिजर्व बैंक ने महंगाई का आकलन 70 डॉलर प्रति बैरल के कच्चे तेल के दाम पर किया था, लेकिन तब से अब तक ये औसतन 30 डॉलर के करीब बढ़ चुका है। ऐसे में अगर पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ते हैं तो महंगाई भी बढ़ेगी। साथ ही रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ेंगी। ब्याज दरें बढ़ने का असर सबसे ज्यादा घर खरीदारों पर देखने को मिलेगा। उन्हें कर्ज पर ज्यादा ब्याज देना होगा। वहीं, डीजल महंगा होने से सप्लाई चेन महंगी हो जाएगी जो जाहिर है हर उत्पाद के दाम को बढ़ा देगा। महंगाई से कम आयवर्ग के लोगों की कमाई खाने पीने, बेहद जरूरी चीजों की खरीद में ही खर्च हो जाएगी और वे मांग बढ़ाने में योगदान नहीं दे पाएंगे।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here