नारदा केस: जब सुप्रीम कोर्ट के सवालों में उलझ कर रह गई CBI, जानें कैसे एजेंसी का दांव पड़ा उलटा?

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टीएमसी के नेताओं की नजरबंदी के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत में सीबीआई की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इतने सवाल उठाए कि वह उनमें उलझ गई और अंतत: याचिका वापस लेने में ही भलाई समझी। हालांकि, याचिका वापस लेने की सलाह भी सीबीआई को कोर्ट से ही मिली थी। कोर्ट के इस सवाल से सीबीआई बुरी तरह हिल गई कि उसने उन अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है, जिनके खिलाफ चार्जशीट दायर हो चुकी है, लेकिन जिनके खिलाफ चार्जशीट दायर नहीं हुई है, वे बाहर हैं। कोर्ट का इशारा हाल ही में भाजपा में शामिल टीएमसी नेताओं की तरफ था। कोर्ट ने कहा कि हमारे हिसाब से ये अभियुक्त गवाहों को प्रभावित करने की ज्यादा सुदृढ़ स्थिति में हैं।

आरोपी नजरबंदी के बावजूद सीबीआई की निगरानी में 
जस्टिस विनीत शरण और बीआर गवई की पीठ ने कहा कि आरोपी नजरबंदी के बावजूद सीबीआई की निगरानी में हैं। पीठ ने पूछा कि वास्तव में सीबीआई की शिकायत क्या है। हम जानना चाहते हैं कि आप हमसे क्या चाहते हैं। जस्टिस गवई ने 17 मई को कलकत्ता उच्च न्यायालय की बैठक के संदर्भ में कहा कि हमने देखा है कि स्वतंत्रता से निपटाने के लिए विशेष पीठों को सौंपा गया है। लेकिन, यह पहली बार है जब एक विशेष पीठ को मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता वापस लेने के लिए सौंपा गया है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वह राज्य के मुख्यमंत्री या कानून मंत्री का समर्थन नहीं कर रही है और केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे पर बात कर रही है। बेहतर होगा आप याचिका वापस लें। क्योंकि जब हम प्रतिवादियों (जिनमें राज्य सरकार भी शामिल है) को सुनेंगे तो हमें भी नहीं पता वे क्या क्या बोलेंगे।

मामला केवल जमानत के मुद्दे का नहीं 
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह मामला केवल जमानत के मुद्दे का नहीं है। इसमें कानून के शासन से जुड़े बड़े मुद्दे शामिल हैं। एसजी ने कहा कि इस राज्य में ऐसा होता रहता है। मुख्यमंत्री आरोपी की मदद के लिए पुलिस थाने में घुस जाते हैं। कानून मंत्री सीबीआई जज के सामने बैठा रहता है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यदि ये तथ्य बेंच के विवेक को नहीं हिलाते हैं, तो उनके पास आगे कहने के लिए कुछ भी नहीं है। केंद्र सरकार के शीर्ष कानून अधिकारी ने मामले को शुक्रवार तक के लिए स्थगित करने का आग्रह किया। लेकिन, पीठ ने कहा कि आपके जल्द सुनवाई के आग्रह पर ही मामले की सुनवाई आज की जा रही है। आपने ही इसके लिए उल्लेख किया था।

जस्टिस विनीत सरन ने कहा कि मैं 18 साल से जज हूं। सामान्यतया यदि पीठ के न्यायाधीशों में से एक का जमानत के मुद्दे पर भिन्न विचार होता है तो बड़ी पीठ के फैसले तक जमानत दी जाती है। जस्टिस गवई ने भी सीबीआई से पूछा कि उच्च न्यायालय को मामले की सुनवाई के अवसर से क्यों वंचित किया जाए। आखिर पांच जजों की बेंच सुनवाई कर रही है। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल को याद दिलाया कि जहां तक संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण का सवाल है तो उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय एक ही पायदान पर हैं।

मुद्दा गुंडागर्दी के अभूतपूर्व कृत्यों का   
एसजी ने जवाब दिया कि मैं केवल कानूनी रूप से जवाब देना चाहता हूं। एसजी ने फिर दोहराया कि मुद्दा सिर्फ जमानत का नहीं है बल्कि राज्य के मंत्रियों के कहने पर गुंडागर्दी के अभूतपूर्व कृत्यों का है। जस्टिस गवई ने कहा, हम नागरिकों की स्वतंत्रता के मुद्दे को राजनेताओं के अवैध कृत्यों के साथ नहीं मिलाना चाहते, हमें देखना होगा कि जमानत दी जा सकती है या नहीं। अन्य मुद्दों के संबंध में अन्य उपाय हैं। उससे आपको किसी ने नहीं रोका है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे पहले देखी जाती है। अन्य को प्रासंगिक कार्यवाही में देखा जाता है।

बेंच ने सुझाव दिया कि सीबीआई सुप्रीम कोर्ट से मामले को वापस ले और कलकत्ता उच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष मुद्दों को उठाए। सॉलिसिटर जनरल ने इसके बाद निर्देश लेने के लिए कुछ मिनट मांगे। जब  मामले को फिर से लिया गया तो सॉलिसिटर जनरल ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। पीठ ने सीबीआई को कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दों को उठाने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

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