न मौत से बचाती है और न कम करती है वेंटिलेटर का जोखिम, फिर क्यों भारत में रेमेडेसिविर को लेकर है मारामारी?

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देश में जिस रेमेडेसिवर दवा को लेकर सबसे ज्यादा मारामारी मची हुई है, वह संक्रमित मरीज की मौत के जोखिम को कम करने में कारगर नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोविड-19 उपचार में उपयोग की जा रहीं रेमेडेसिवर समेत चार प्रमुख दवाओं पर किए गए वैश्विक अध्ययन से यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में रेमेडेसिवर, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन समेत चार दवाओं का मरीजों के उपचार में सबसे ज्यादा उपयोग किया जा रहा है। पर शोध में पाया गया कि ये दवाएं मौत का जोखिम घटाने में बिल्कुल कारगर नहीं हैं।

30 देशों में अध्ययन
डब्लूएचओ के सॉलिडेटरी ट्रायल के तहत कोविड-19 के उपचार में उपयोग की जा रहीं चार सर्वाधिक प्रचलित दवाओं रेमेडेसिवर, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन, लोपिनवीर-रटनवीर और इंटरफेरॉन बीटा -1 ए का अध्ययन दुनिया के तीस देशों में किया गया। जिसमें 405 अस्पतालों के 11266 संक्रमित मरीजों को शामिल किया गया।

ऐसे किया शोध
वैज्ञानिकों ने रेमेडेसिवर, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वाइन, लोपिनवीर-रटनवीर और इंटरफेरॉन बीटा -1 ए दवाओं के माध्यम से उपचार किए जा रहे मरीजों का अध्ययन किया। जिसमें रेमेडेसिवर दवा पाने वाले मरीजों की अवस्था को लेकर पांच बार फॉलोअप किए गए ताकि इस सर्वाधिक प्रचलित दवा के असर की सही-सही जानकारी सामने आ सके।

वेंटिलेटर और मौत का जोखिम नहीं घटाती
शोध में जो परिणाम सामने आए हैं, वे प्रारंभिक स्तर के हैं पर ये दवाओं पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। शोध के मुताबिक, रेमेडेसिवर समेत चारों सर्वाधिक उपयोग की जा रहीं दवाओं के जरिए मरीजों में वेंटिलेटर की आवश्यकता को कम नहीं किया जा सकता। न ही इन दवाओं से मृत्यु के जोखिम को कम करने में कोई मदद मिलने के रुझान मिले। इतना ही नहीं, जिन मरीजों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या इंटरफेरॉन बीटा -1 ए दी जा रही थी, उनकी बचने की संभावना पायी गई।

बड़ा झटका मानते विशेषज्ञ
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के महामारी विशेषज्ञ ने डब्लूएचओ के इस अध्ययन के बारे में कहा है कि यह वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होगा। उन्होंने कहा कि शोध में सभी दवाओं का समग्र अध्ययन हुआ। हमें उम्मीद थी कि अन्य दवाओं के मुकाबले रेमेडेसिवर का प्रदर्शन बेहतर होगा पर इससे मरीज के उपचार में कोई विशेष लाभ न मिलना बेहद निराशाजनक है। गौरतलब है कि अभी यह एक प्री-प्रिंट शोध है जिसकी समीक्षा होना बाकी है।

इस तरह लोकप्रिय बन गई रेमेडेसिवर दवा
पिछले साल कोरोना महामारी की शुरूआत में रेमेडेसिवर पर दुनिया के कई देशों में क्लीनिकल ट्रायल हुए जिनमें पाया गया कि इस दवा के इस्तेमाल से रोगियों के ठीक होने का समय 15 दिन से घटकर 11 दिन हो जाता है। इसके बाद इस दवा की मांग दुनियाभर में बढ़ गई। यह अध्ययन अमेरिकी एजेंसी ने करायी थी। तब इस दवा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बयान दिए थे। दवा निर्माता कंपनी गिलीएड ने कहा था कि जब तक महामारी चलेगी, वह इस दवा के निर्माण के लाइसेंस पर कोई रॉयल्टी नहीं लेगी। मई के आसपास भारत सरकार ने भी इस दवा के आधिकारिक उपयोग को मंजूरी दे दी थी।

भारत में मारामारी : कहीं ब्लैक में बिक रही, कहीं हुई चोरी
इस दवा की बढ़ती मांग के बीच भारत में इसकी भारी कमी की खबरें आ रही हैं हालांकि भारत सरकार ने कहा है कि दवा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। वहीं, इस दवा के सरकारी अस्पताल से चोरी होने की घटना सामने आयी है । भोपाल के हमीदिया हॉस्पिटल से शनिवार को 853 रेमडेसिविर इंजेक्शन चोरी हो गए। चोरों ने सेंट्रल स्टोर की ग्रिल काट कर इंजेक्शन चुरा लिए। इस घटना की जांच जारी है।

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