फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज़ इंडिया अध्ययन का खुलासा – पांच राज्यों में मेडिकल गर्भपात दवाइयों की चिंताजनक कमी

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ब्लर्ब: ऍफआरएचएस (FRHS) इंडिया ने 6 राज्यों में अध्ययन कर पाया कि 6 में से 5 राज्यों में एमए (MA) दवाइयों की स्टॉकिंग अपर्याप्त है

भोपाल, 10 अगस्त, 2020: फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज़ इंडिया (ऍफआरएचएसआई) (FRHSI) ने छह राज्यों में कुल 1500 दवाई विक्रेताओं को शामिल कर एक अध्ययन किया जिससे यह खुलासा हुआ कि छह में से पांच राज्यों में यानी कि मध्य प्रदेश (6.5%), पंजाब (1.0%), तमिल नाडू (2.0%), हरियाणा (2.0%), और दिल्ली (34.0%) में एमए (MA) दवाइयों की  अत्यधिक कमी है। केवल असम (69.6%) में स्थिति बेहतर है।

क्रमांकराज्य% दवाई दुकानें जो एमए (MA) दवाइयां रखते हैं
 पंजाब1.0%
 हरियाणा2.0%
 तमिल नाडू2.0%
 मध्य प्रदेश6.5%
  दिल्ली34.0%
 असम69.6%

ऐसा प्रतीत होता है कि दवा नियंत्रण प्राधिकरणों द्वारा अतिनियंत्रण के परिमाणस्वरुप दवाई की दुकानों में एमए (MA) दवाइयां नहीं रखी जातीं। कानूनी झंझट और ज़रूरत से ज़्यादा दस्तावेज़ जमा करने की परेशानी से बचने के लिए लगभग 79% दवाई विक्रेताओं ने एमए (MA) दवाइयां रखनी बंद कर दी हैं। 54.8% दवाई विक्रेताओं के अनुसार अनुसूची एच (H) दवाइयों के मुकाबले एमए (MA) दवाइयां ज़्यादा नियंत्रित हैं। यहां तक कि असम में भी जहां इन दवाइयों की स्टॉक सबसे ज़्यादा है, वहां भी 58% दवाई विक्रेता एमए (MA) दवाइयों पर अतिनियंत्रण की सूचना देते हैं। राज्यों की बात करे तो, हरियाणा में 63%, मध्य प्रदेश में 40%, पंजाब में 74% और तमिल नाडू में 79% दवाई विक्रेताओं के अनुसार एमए (MA) दवाइयां न रखने के पीछे नियामक/कानूनी प्रतिबंध ही मुख्य कारण है।

इस रिपोर्ट के सामने आने पर प्रतिज्ञा अभियान एडवाइज़री ग्रूप के सदस्य और फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज़ इंडिया के चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव ऑफिसर श्री वी.एस. चन्द्रशेकर ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, “पूरे भारतवर्ष में ज़्यादातर महिलाएं मेडिकल गर्भपात का विकल्प चुन रही हैं और वर्तमान स्थिति में इसकी अनुपलब्धि के कारण महिलाओं द्वारा  सुरक्षित गर्भपात चुनने के अधिकार में बाधा आ रही है। यह साबित हो चुका है कि एमए (MA) दवाइयों द्वारा सुरक्षित और असरदार तरीके से गर्भपात संभव है, इसलिए इनके उपलब्ध न होने की स्थिति में देश को असुरक्षित गर्भपात, मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में आई कमी से जो फ़ायदा हुआ है वह संभवत: नुकसान में बदल सकता है।”

हालांकि, इस अध्ययन का लक्ष्य एमए (MA) दवाइयों की उपलब्धता का पता लगाना था, इससे प्राप्त तथ्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि तमिल नाडु राज्य के दवाई दुकानों में आपातकालीन (इमरजेंसी) गर्भनिरोधक गोलियां (इसीपी) (ECPs) नहीं मिलती। राज्य सर्वेक्षण में शामिल दवाई विक्रेताओं में से केवल 3% विक्रेताओं के पास इसीपी (ECPs) के स्टॉक थे और बाकी 90% विक्रेता जिनके पास इन दवाइयों का स्टॉक नहीं था उनके अनुसार सरकार द्वारा इन दवाइयों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा हुआ है। आपातकालीन (इमरजेंसी) गर्भनिरोधक गोलियां ऐसी दवाइयां हैं जो बिना नुस्खा पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) की ख़रीदी जा सकती हैं और राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत ये दवाइयां आशा (ASHAs) द्वारा रखी और वितरित की जाती हैं। इसीपी (ECPs) पर प्रतिबंध लगाकर दवाई विक्रेताओं को उनके स्टॉक न रखने देना तमिल नाडू की महिलाओं द्वारा सुरक्षित और आसान तरीके से गर्भपात कराने के अधिकार को छीन रहा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि एमए (MA) कॉम्बीपैक्स के बारे में गलत जानकारी एमए (MA) दवाइयां न रखने का मुख्य कारण है। नियामक अफ़सरों का मानना है कि लिंग चयन के लिए एमए (MA) कॉम्बीपैक्स का इस्तेमाल किया जा सकता है। एमए (MA) कॉम्बीपैक का इस्तेमाल गर्भावस्था के नौ हफ़्ते पूरे होने से पहले किया जा सकता है जबकि गर्भावस्था के 13-14 हफ़्ते होने के बाद ही अल्ट्रा साउंड द्वारा भ्रूण के लिंग का पता लगाया जा सकता है। ख़ुशी की बात है कि दवाई विक्रेता इस गलतफ़हमी का शिकार नहीं हैं। जिन राज्यों में यह अध्ययन किया गया वहां के कुल दवाई विक्रेताओं में से लगभग केवल 10% विक्रेताओं को यह गलतफ़हमी थी कि एमए (MA) दवाइयों द्वारा लिंग का पता लगाकर गर्भपात कराना संभव है। हालांकि, तमिल नाडू में 36% दवाई विक्रेता इस गलतफ़हमी के शिकार थे।

ऍफआरएचएस (FRHS) इंडिया की क्लिनिकल सर्विसेज़ डायरेक्टर, श्रीमती रश्मी आर्डे के अनुसार “ऐसे अप्रत्याशित समयकाल में जब लोगों के आने-जाने पर पाबंदी है और केवल कुछ ही मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध हैं, यह बहुत ज़रूरी है कि इन दवाइयों की बिक्री पर लागू अनावश्यक प्रतिबंध हटाकर दवाई दुकानों में मेडिकल गर्भपात दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को स्पष्ट करना चाहिए कि एमए (MA) दवाइयां जिन्हें भारत में महिलाएं गर्भवती होने के बाद 9 हफ़्तों के अंदर ले सकती हैं, इनका इस्तेमाल चयनात्मक गर्भपात के लिए नहीं किया जा सकता। इससे महिलाएं नुस्खा पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) द्वारा स्वस्थ्य देखभाल और दवाइयां ख़रीद पाएंगीं।”

अत्यधिक जांच-पड़ताल और अतिनियंत्रण के कारण एमए (MA) दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है जो कि एक चिंता का विषय है और इससे लाखों महिलाएं सुरक्षित गर्भपात उपाय अपना नहीं पा रही हैं। वर्ष 2019 में, डब्ल्यूएचओ (WHO) ने एमए (MA) दवाई संबंधी परामर्श जिसके अनुसार इन दवाइयों को मेडिकल निगरानी के अंदर लेने की ज़रूरत थी, उसे खारिज करके इन्हें ज़रूरी दवाइयों की मूलभूत सूची (कोर लिस्ट ऑफ़ एसेंशियल मेडिसिंस) में शामिल किया। एमए (MA) दवाइयों को स्टॉक करने के संबंध में लागू अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाने से सुनिश्चित रूप से महिलाएं अपनी पसंदीदा गर्भपात प्रक्रिया अपना सकेंगी। ऍफआरएचएस इंडिया की सीनियर मैनेजरपार्टनरशिप्स, देबांजना चौधरी के अनुसार “मेडिकल गर्भपात ने काफ़ी हद तक आरंभिक गर्भपात देखभाल संबंधी खर्चों को कम कर दिया है जिस कारण महिलाएं इसे आसानी से अपनाती हैं। कोविड के चलते, बहुत से प्रोवाइडरों ने सर्जिकल गर्भपात करने से पहले कोविड 19 टेस्ट कराने की मांग शुरू कर दी है जिससे सर्जिकल गर्भपात संबंधी खर्चों में और बढ़ोतरी हो सकती है। सर्जिकल गर्भपात के मुकाबले एमए (MA) दवाइयां सस्ती हैं क्योंकि इनके लिए कोई क्लिनिकल सेट अप की ज़रूरत नहीं होती। एमए (MA) दवाइयों की अनुपलब्धता से महिलाएं सर्जिकल गर्भपात का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में गर्भपात संबंधी खर्च में बढ़ोतरी होने पर इस ओर महिलाओं की पहुंच दर में भी कमी आ सकती है।”

(टिप्पणी: मैंने यहां कोविड 19 टेस्ट के बारे में तथ्य शामिल किया है, कृपया इस बारे में अपनी राय दें।)

इसके अलावा इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि एमए (MA) दवाइयों द्वारा लिंग चयन कर गर्भपात कराने की गलतफ़हमी को दूर करने की ज़रूरत है; केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन अनुमोदन/आवश्यकताओं और एमटीपी (MTP) अधिनियम में तालमेल लाने की ज़रूरत है; एमटीपी (MTP) नियमों में बदलाव लाने हैं जिससे एमबीबीएस (MBBS) डॉक्टरों को नुस्खा पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) द्वारा एमए (MA) दवाइयां सुझाने का अधिकार मिले;  एमए (MA) कॉम्बी-पैक को औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम की अनुसूची K में शामिल करने की ओर विचार करना चाहिए; आईईसी (IEC) और मीडिया पहुंच द्वारा सुरक्षित गर्भपात संबंधी जानकारी प्रचार कार्यों में ज़्यादा पूंजीनिवेश करना चाहिए और जो महिलाएं एमए (MA) दवाइयां लेती हैं उनके लिए टोल-फ़्री हेल्पलाइन नंबर जारी कर उन्हें मदद प्रदान करनी चाहिए।

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