वसीयत करते समय रखें इन बातों का ध्यान

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वसीयत
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वसीयत इस एक शब्द से किसी भी व्यक्ति के जहन में वसीयत का निष्पादन करने के पूर्व पूरे जीवन के आय व्यय सम्पत्ति के दृश्य प्रकट होने लगते है और व्यक्ति जन्म मृत्यु के विचारों मे उलझता है और एक अनजाना डर भी उन विचारों में चलता रहता है।
वसीयत एक वैधानिक दस्तावेज होता है जो किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने जीवनकाल में अपनी सम्पत्ति के संबंध उसके मरने के बाद सम्पत्ति का उत्तराधिकारी निर्धारित करता है जिसे आम भाषा में कहा जाये तो यह कहना सही होगा कि जब तक व्यक्ति (वसीयतकर्ता) जीवित है तब तक वसीयत मृत है और जब व्यक्ति मृत है तो वसीयत जीवित है।
वर्तमान समय मंे जीवन की अनिश्चितता को देखते हुए भविष्य में किसी भी व्यक्ति (वसीयतकर्ता) के उत्तराधिकारियों, सगे संबंधियों में उसकी सम्पत्ति को लेकर किसी भी प्रकार के वाद विवाद न हो और सम्पत्ति कानूनी दांव पेचों मे न उलझें इसलिये समय की मांग है कि व्यक्ति द्वारा अपनी वसीयत का निष्पादन कराया जावे।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 के अन्तर्गत किसी भी योग्य व्यक्ति द्वारा चल एवं अचल सम्पत्ति के संबंध में वसीयत का निष्पादन कराया जा सकता है। अधिनियम के अन्तर्गत योग्य व्यक्ति वह है जो स्वस्थ मानसिक चित्त एवं वयस्क होना चाहिए। वसीयत के प्रावधानों में सबसे महत्वपूर्ण यह है व्यक्ति उसी सम्पत्ति की वसीयत कर सकता है जो उसके द्वारा स्वयं अर्जित की गई हो वह अपनी पैतृक सम्पत्ति को वसीयत नहीं कर सकता है। वसीयत के संदर्भ में स्त्री एवं पुरूष के संबंध में कोई भेद नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवनकाल में वसीयत को बदल भी सकता है। वसीयत संबंधी प्रावधानों के अन्तर्गत वो ही वसीयत महत्व रखती है जो वसीयतकर्ता की मृत्यु से पूर्व अंतिम वसीयत की श्रेणी में आती हो।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में वसीयत का पंजीयन या नोट्राइज्ड होना अनिवार्य नहीं है सादे कागज लिखित दस्तावेज भी वसीयत की श्रेणी में आता है परंतु उस पर दो साक्षियों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। किसी भी वसीयत की पूर्णता इससे सिद्ध होती है कि वसीयतकर्ता द्वारा वसीयत का निष्पादन किये जाते समय दो स्वस्थ चित्त वयस्क साक्षियों के समक्ष हस्ताक्षर कर वसीयत निष्पादित की गई हो और वसीयत के दोनों साक्षियों द्वारा एक दूसरे की उपस्थिति में वसीयतकर्ता के समक्ष वसीयत पर हस्ताक्षर किये हों। परंतु मेरा निजी परामर्श है कि वसीयत को उपपंजीयक कार्यालय में उपस्थित होकर रजिस्ट्रेशन करवा लेना चाहिए क्योंकि वसीयतकर्ता के न रहने पर उत्तराधिकारी/ वसीयतगृहिता के समक्ष यह तर्क होता है वसीयतकर्ता द्वारा अपने जीवनकाल में उपपंजीयक कार्यालय में उपस्थित होकर उपपंजीयक के समक्ष हस्ताक्षर कर वसीयत का निष्पादन किया गया है एवं वसीयत के दोनांे साक्षियों द्वारा एक दूसरे की उपस्थिति में उपपंजीयक के समक्ष हस्ताक्षर किये हैं और शासन द्वारा निर्धारित शुल्क अदा किया है। मेरे मतानुसार वर्तमान आधुनिक और तकनीकी युग में जिस व्यक्ति द्वारा भी वसीयत निष्पादित की जा रही है तो वसीयत बनाते समय अथवा पंजीयन के समय वीडियो तैयार कर लिया जावे जिससे भविष्य में वसीयत को दी जाने वाली चुनौती का जोखिम कम किया जा सकें।

कपिल मेहरा
लेखक वरिष्ठ एडवोकेट एवं
ऊषा लीगल एज्युकेशन एण्ड सोशल वेलफेयर सोसायटी के सचिव हैं।

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