स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में ऑटो रिन्यू का विकल्प न लें, पूरी पड़ताल के बाद स्वयं करें रिन्यू

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स्वास्थ्य बीमा कंपनियां पॉलिसी का रिन्यूअल कराने के लिए ऑटो रिन्यू का भी विकल्प देती हैं। यानी एक बार आपने पॉलिसी खरीद ली उसके बाद हर साल आपके खाते से उसका प्रीमियम कटते रहेगा। इसके लिए कंपनियां पॉलिसी खरीदते वक्त ही बीमाधारक से सहमति पत्र ले लेती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटो रिन्यू घाटे का सौदा है। उनका कहना है कि हो सकता है एक साल के बाद दूसरी कंपनी उससे भी कम प्रीमियम पर ज्याद सुविधा की पेशकश करे। ऐसे में आंखमूंदकर ऑटो रिन्यू करने का विकल्प आपके लिए घाटे का सौदा हो सकता है।

पेशकश की करें पड़ताल

प्रोबस इंश्योंरेंस के निदेशक राकेश गोयल का कहना है कि पॉलिसी रिन्यू कराने के पहले उसमें की जा रही पेशकश की पड़ताल करें। उनका कहना है कि बीमा क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने से कंपनियां एक-दूसरे से बेहतर पॉलिसी देने की होड़ में लगी हुई हैं। ऐसे में मौजूदा पॉलिसी रिन्यू कराने के लिए अन्य कंपनियों की पेशकश को परखें। यदि दूसरी कंपनियां कम प्रीमियम में ज्यादा सुविधा वाली पॉलिसी दे रही है तो उसे खरीदना पुरानी को रिन्यू कराने से ज्यादा बेहतर है।

पोर्ट कराने के पहले बरतें सावधानी

अब पॉलिसी पोर्ट कराने का भी विकल्प मिलने लगा है। ‌‌‌विशेषज्ञों का कहना है कि पॉलिसी को पोर्ट कराने के पहले मौजदा पॉलिसी और नई पॉलिसी की तुलना जरूर करें। विशेषज्ञों का कहना है कि पोर्ट कराने के पहले उस बीमा कंपनी का क्लेम सेटलेंट रेश्यो पर गौर करें। यह रेश्यो औसतन 90 फीसदी होता है और जितना अधिक होता है उतना ही अच्छा माना जाता है। ऐसे में केवल सुविधाएं देखकर पोर्ट कराना चाह रहे हैं तो क्लेम सेटलमेंट का कम अनुपात आपके लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

जिम्मेदारियों से पॉलिसी को परखें

बीमा कंपनियां 21 से 25 साल के युवाओं के लिए दो हजार रुपये से कम के प्रीमियम पर भी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी की पेशकश करती हैं। वहीं 42 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए करीब छह हजार रुपये लेती हैं। पत्नी और बच्चों को भी बीमा कवर देने वाली पॉलिसी महंगी होती है। ऐसे में जो पॉलिसी आपने 21 साल की उम्र में अविवाहित रहते ले रखी है वह शादी के बाद आपकी पत्नी और बच्चे का कवर नहीं देगी। ऐसे में पुरानी पॉलिसी रिन्यू कराना घाटे का सौदा है।

इन बातों का रखें ध्यान

विशेषज्ञों का कहना है कि पॉलिसी खरीदते समय कमरे का किराया (रूम लिमिट) पर जरूर गौर करें। पॉलिसी ऐसी होनी चाहिए जिसमें कमरे के किराया को लेकर कोई सीमा न हो क्योंकि आप नहीं जानते कि मुसीबत के समय आपका इलाज कहां होगा। साथ ही सह-भुगतान यानी को-पेमेंट विकल्प से भी बचें। कंपनियां क्लेम राशि का 25 से 30 फीसदी बीमाधारक को उठाने का विकल्प देते हैं जो आपके लिए फायदे का सौदा नहीं है।

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